उत्तराखण्ड

देहरादून में ‘2 गज जमीन’ पर तकरार मोरोवाला, सुभाषनगर में मुर्दे दफनाने पर रोक, क्या कहती हैं शरीअत।

उत्तराखंड की राजधानी देहरादून में इन दिनों कब्रिस्तानों में ‘दो गज जमीन’ को लेकर विवाद गहरा गया है। शहर के मोरोवाला और सुभाषनगर स्थित कब्रिस्तानों में मुर्दों को दफनाने को लेकर स्थानीय और ‘बाहरी’ की तकरार शुरू हो गई है।

स्थानीय प्रबंधन द्वारा जो मूल रूप से टिहरी, पौड़ी या उत्तर प्रदेश के बिजनौर और सहारनपुर जैसे जिलों से आए परिवारों को ‘बाहरी’ बताकर जगह देने से मना किया जा रहा है यह गंभीर मामला अब पुलिस, प्रशासन और वक्फ बोर्ड की चौखट तक पहुंच गया है।

विवाद की शुरुआत हाल ही में हुई जब टर्नर रोड निवासी अकबर हुसैन के इंतकाल के बाद उन्हें सुभाषनगर कब्रिस्तान में दफनाने से रोक दिया गया। परिजनों के विरोध के बावजूद सहमति न बनने पर अंततः शव को चंदरनगर ले जाकर सुपुर्द-ए-खाक करना पड़ा। इसी तरह की शिकायतें मोरोवाला से भी आ रही हैं, जहां स्थानीय कमेटियों ने जगह की कमी का हवाला देकर नए शवों के लिए गड्ढा खोदने से हाथ खड़े कर दिए हैं।

 

वही कब्रिस्तान को लेकर सवाल सिर्फ ज़मीन का नहीं, बल्कि दीन और इंसानियत से जुड़ा हुआ मसला है। शरीअत (इस्लामी कानून) इस विषय पर साफ़ दिशा-निर्देश देती है।

शरीअत क्या कहती है?

कब्रिस्तान पूरी मुस्लिम उम्मत के लिए होता है

इस्लाम में कब्रिस्तान किसी एक परिवार, बिरादरी या इलाके की निजी मिल्कियत नहीं होता। यह आम मुसलमानों के लिए होता है, ताकि हर मुसलमान को इज्जत के साथ दफनाया जा सके।

वक्फ की ज़मीन का हुक्म

अगर कब्रिस्तान वक्फ (धार्मिक दान) की ज़मीन है, तो वह अल्लाह के नाम पर हमेशा के लिए समर्पित होती है।

➤ ऐसे में किसी भी मुसलमान को, चाहे वह स्थानीय हो या बाहरी, दफनाने से रोकना शरीअत के खिलाफ माना जाता है।

बाहरी vs स्थानीय का मुद्दा

शरीअत में “बाहरी” या “स्थानीय” जैसा भेदभाव नहीं है।

➤ हर मुसलमान का हक है कि उसे किसी भी मुस्लिम कब्रिस्तान में दफनाया जा सके, खासकर जब कोई और व्यवस्था न हो।

इंतजामिया (प्रबंधन) की जिम्मेदारी

कब्रिस्तान की देखरेख करने वाले लोग (कमेटी/इंतजामिया) व्यवस्था बना सकते हैं—

जैसे जगह की कमी या सिस्टम भ्रष्ट 

➤ वे किसी मुसलमान को पूरी तरह मना नहीं कर सकते, अगर उसके पास कोई और विकल्प न हो।

शरीअत के मुताबिक कब्रिस्तान पर हर मुसलमान का हक है।

इसे लेकर भेदभाव, रोक-टोक या “बाहरी-स्थानीय” का विवाद इस्लामी शिक्षाओं के खिलाफ जाता है।

कब्रिस्तान का मुद्दा हमें यह याद दिलाता है कि मौत के बाद इंसान की पहचान सिर्फ इंसानियत और उसके ईमान से होती है, न कि उसके शहर या बिरादरी से। ऐसे में ज़रूरी है कि हम इस्लाम की मूल भावना—बराबरी, इंसाफ और भाईचारे—को समझें और उसी के अनुसार फैसले लें।

इस मामले पर उत्तराखंड वक्फ बोर्ड के अध्यक्ष शादाब शम्स ने सख्त रुख अपनाया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि कब्रिस्तान किसी निजी व्यक्ति या कमेटी की जागीर नहीं है और किसी भी मुस्लिम को दफनाने से मना करना नियम विरुद्ध है। उन्होंने कुछ लोगों पर इस संवेदनशील मुद्दे पर राजनीति करने का आरोप भी लगाया।

प्रशासनिक स्तर पर समाधान देते हुए शम्स ने बताया कि हरिद्वार बाईपास पर कबाड़ी पुल के पीछे करीब 16 बीघा जमीन कब्रिस्तान के लिए पहले से आवंटित है। पूर्व मेयर विनोद चमोली के प्रयासों से मिली इस जमीन का उपयोग करने के लिए एक महीने पहले ही कमेटी गठित की जा चुकी है। वक्फ बोर्ड ने लोगों से अपील की है कि वे भीड़भाड़ वाले इलाकों के बजाय इस नए और बड़े कब्रिस्तान का उपयोग करे।

इस पूरे मामले में देखिए वरिष्ठ समाजसेवी खुर्शीद शाहब  ने क्या कहा वीडियो देखने के लिए link 🔗 पर क्लिक करे।

 

 

 

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