धौलास भूमि विवाद: भूखण्ड धारकों ने सौंपा ज्ञापन, भ्रामक खबरों का किया कड़ा खंडन
खाता संख्या 531 को लेकर डेमोग्राफी बदलने के आरोप बेबुनियाद, 165 क्रेताओं ने प्रशासन से निष्पक्ष सुनवाई की मांग

देहरादून के मौजा धौलास स्थित खाता संख्या 531 में शेखुल हिन्द एजुकेशनल चैरिटेबल ट्रस्ट द्वारा विक्रय की गई भूमि को लेकर सोशल मीडिया और कुछ स्थानीय समाचार चैनलों पर प्रसारित कथित भ्रामक खबरों के विरोध में भूखण्ड धारकों ने प्रशासन को ज्ञापन सौंपा है। भूखण्ड धारकों का कहना है कि भूमि के संबंध में जानबूझकर गलत और भड़काऊ सूचनाएं फैलाई जा रही हैं, जिससे उनकी सामाजिक छवि और निवेश पर संकट खड़ा हो गया है।
ज्ञापन में बताया गया कि उक्त भूमि पर लगभग 165 व्यक्तियों ने अपने जीवनभर की जमा पूंजी निवेश कर छोटे-छोटे भूखण्ड खरीदे हैं। इनमें अधिकांश उत्तराखंड के मूल निवासी हैं और कई पूर्व सैनिक भी शामिल हैं। भूखण्ड धारकों ने स्पष्ट किया कि सभी क्रेता हिंदू समुदाय से हैं और किसी भी प्रकार की मुस्लिम कॉलोनी बसाने या क्षेत्र की डेमोग्राफी बदलने का आरोप पूरी तरह निराधार और तथ्यहीन है।



भूखण्ड धारकों के अनुसार भूमि क्रय से पूर्व परगनाधिकारी, तहसीलदार और लेखपाल सहित संबंधित राजस्व अधिकारियों से विधिवत जानकारी ली गई थी। अधिकारियों द्वारा भूमि को सभी प्रकार के वाद-विवाद से मुक्त तथा संक्रमणीय अधिकारों वाली कृषि भूमि बताया गया था। राजस्व अभिलेखों में पूर्व स्वामियों का नाम नियमानुसार संक्रमणीय भूमिधर श्रेणी-1(क) में दर्ज है।
ज्ञापन में यह भी उल्लेख किया गया कि पूर्व स्वामी संस्था ने सरकार की अनुमति से भूमि क्रय की थी और प्रस्तावित योजना पर कार्य संभव न होने के कारण पुनः सरकारी अनुमति लेकर ही भूमि का विक्रय किया गया। दाखिल-खारिज वादों की आख्या भी स्पष्ट है और सभी भूखण्ड नियमानुसार स्टाम्प शुल्क अदा कर खरीदे गए हैं।
वर्तमान में उक्त भूमि खुले भूखण्ड के रूप में है, जहां किसी भी प्रकार का आवासीय निर्माण या गतिविधि नहीं चल रही है। सभी 165 भूखण्ड धारकों ने सामूहिक रूप से इसे “महादेव रेजीडेंसी” के नाम से सीमांकित किया है, जिसके लिए विभागीय एवं राजस्व स्तर की अनापत्ति भी उपलब्ध है।
भूखण्ड धारकों ने आरोप लगाया कि कुछ स्थानीय लोग दुर्भावना के चलते भयादोहन कर रहे हैं, जिससे निवेशकों में असुरक्षा की भावना पैदा हो रही है। उन्होंने प्रशासन से मांग की है कि यदि भूमि के संबंध में किसी प्रकार की जांच या कार्रवाई प्रस्तावित हो, तो एकपक्षीय निर्णय लेने से पूर्व उन्हें समुचित सुनवाई का अवसर दिया जाए, ताकि किसी के साथ अन्याय न हो।




