
इल्म की शम्मा को रोशन किया 13 वर्षीय हमज़ा अली ने कुरान ए करीम को पढ़ा,
जिस उम्र में बच्चे ठीक से बोल नहीं पाते, ज़िंदगी और समाज की परख व समझ से ग़ाफ़िल रहते है। उस उम्र में पत्रकार सलमान अली के साहबज़ादे 13 वर्षीय हमज़ा अली ने आसमानी किताब एवं इस्लाम की पाक मुक़द्दस किताब (जिसको इस्लाम में क़ुरआन-ए-पाक या क़ुरआन शरीफ कहा जाता है) उसको पढ़ा,
हमजा की इस उपलब्धि से जहां घर परिवार में खुशी की लहर वही रिश्तेदारों, मोहल्ले और गाव में खुशी का माहौल है! इतनी कम उम्र में हमजा का क़ुरआन शरीफ पढ़ना गर्व की बात है,
दौर-ए-मुल्क की इन कठिन परिस्थितियों में जहाँ वर्तमान की दौर-ए-हुकूमत की बंदिशें और नफ़रती सोच आम हो तो ऐसे में इस्लाम की रस्सी को मज़बूती से पकड़ कर पवित्र/मुक़द्दस कलाम को पढ़ना और समझना आम बात नहीं बल्कि ये हिन्द के मुसलमानों को दीन-ए-इस्लाम में एक बड़ा आयाम और इस्लाम के पिलर को दुनियावी पटल पर मजबूत करने का ज़रिया है।
दुनियावी मामलातों से दूर, दीनी तालीम में मशगूल रहकर दिन-रात की कड़ी मेहनतों और अपने आप को दीन ए इस्लाम की इस्लाह में समर्पित कर ये मुक़ाम हासिल किया जाता है।
बुराइयों को खत्म कर भाईचारे, सद्भाव, एकता, समरसता और सौहार्द का पैग़ाम दुनिया के लोगों तक पहुचाने का काम एक सच्चा मुस्लमान करता है।
दीन-ए-इस्लाम को दुनिया के सामने रिप्रेजेंट करने का काम भी एक सच्चा मुस्लमान करता है।
अपने सीने में अल्लाह का पाक कलाम जब एक हाफिज-ए-क़ुरआन लेकर चलता है तो बुराइयों की परत मिटती हैं और अछाइयों की रोशनी फैलती है।
एक आलिम इस्लाम की डोर को मजबूती से पकड़े रहता है और उसकी हिफ़ाज़त करता है जो ग़ाफ़िल हो चुके होते है उनको सही रास्ता दिखाने का काम एक आलिम-ए-दीन करता है।
हमज़ा अली उन बच्चों के लिए आदर्श है जो गुमराहियत के रास्ते पर चलकर अपनी और परिवार की ज़िंदगी को बर्बादी के कगार पर पहुँचा देते हैं।
जिसमे सिर्फ़ ज़िल्लत और रुसवाई के सिवा कुछ नहीं हासिल होता है।
✍️इफ़्तिख़ार अंसारी (जर्नलिस्ट)सलमान अली 9358627823




